मानव जीवन के तीन प्रकार के ऋण अथवा ऋणत्रय
भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य जन्म लेते ही अपने देवों, ऋषियों और पितरों के प्रति ऋणी हो जाता है। इसीलिए उपनयन संस्कार के अवसर पर ब्रह्मचारी का जो तीन सूत्रों वाला यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है, उसके तीन सूत्र ऋणत्रय के ही प्रतिक होते हैं। इन तीनो ऋणों से मुक्त होने का वर्णन विभिन्न शास्त्रीय ग्रंथों में मिलता हैं।
देवनाम् च पितृणाम् च ऋषिनाम् च तथा नरः।
ऋणवान जायते यासमत तनमोक्षे प्रयतेत सदा।। __ विष्णु धर्मोत्तर पुराण
महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यं आश्रितः।। ___ मनुस्मृति ४.२५७
निवापनेन पितरो विद्याभ्यास श्रावणधारणेन ऋषयः।
अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति ॥ ___ महाभारत, शांति पर्व १९१.१३
देव ऋण
मनुष्य दिव्यशक्तियों के कारण ही उपलब्ध सृष्टि के संसाधनों का उपयोग कर पाता है। ईश्वर की कृपा से ही उसे स्वच्छ वायु, जल, प्रकाश और ऊर्जा मिल पाती है। अतः मनुष्य को ईश्वर तथा देवों के प्रति ऋणी होना चाहिए और यज्ञों व देवस्तुतियों द्वारा देवऋण से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए।
ऋषि ऋण
ब्रह्मचर्य आश्रम में मनुष्य ऋषियों और गुरु कृपा द्वारा ज्ञानवान बनता है। अतः हमें गुरु के प्रति ऋणी होना चाहिए। उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान का प्रयोग में लाना तथा उस ज्ञान से दूसरों को भी लाभान्वित करना ऋषि ऋण से मक्ति का उपाय है।
पितृ ऋण
माता पिता संतानोत्पत्ति द्वारा वंश परम्परा को बनाये रखने तथा संसार की सृष्टि प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देते है। संसार में आने और यहाँ के सुख भोगने का सामर्थ्य माता पिता और पूर्वजों द्वारा ही मिलता है। अतः मनुष्यों को इनका ऋणी माना जाता है, यही पितृ ऋण है। इसे हम पितरो के श्राद्ध तथा संतानोत्पत्ति में सहयोग करके मुक्त हो सकते है।
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